Sunday, 5 May 2019

इस्तियाक मोगल 'फलीश' के चंद अशआर : -


दफ़्न कर दो, जला दो, या इन्हें रख लो संदूक में
ये जिस्म तो मिटटी था, मिटटी है,  मिटटी ही रहेगा
دفن کردو، جلا دو، یا انہی رکھ لو صندوق ہوئی
یہ جسم تو مٹی تھا مٹی ہے  مٹی ‌ ہی رہے گا
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फलीश


कहानियां तुम्हारी  पढ़ तो रहा हूँ मगर
ये तो बताओ मेरा किस्सा कौन सुनेगा?
کہانیاں تمھاری  پڑھ تو رہا ہوں مگر
یہ تو بتاؤ  میرا  قصہ کون سنے  گا
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फलीश



वो उंगली उठाएं तो दर्द लाज़मी है
दो हाथ उठाकर के मांगा था जिसे

وہ انگلی اٹھائی تو درد لازمی ہیں
دو ہاتھ اٹھا کر کے مانگا تھا جسے
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फलीश



तेरे शहर में आकर बाजार में ठहरा हूं
यह तोहीन है तेरे घर की दहलीज की

تیرے شہر میں آکر بازار میں ٹھہرا ہو 
یہ توہین ہے  تیرے گھر  کی دہلیز  کے 
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फलीश



Wednesday, 6 March 2019

कहानी - वो औरत एक माँ थी, लेकिन शादीशुदा नहीं थी.

कहानी- वो औरत एक माँ थी लेकिन शादीशुदा नहीं थी.

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सूरज डूब चुका था. हल्की लाल रौशनी ने अभी तक आसमाँ नहीं छोड़ा था. शहर के सारे पेड़ हवाओं को अलविदा कह रहे थे. ठीक उसी तरह लोग भी थके हारे दफ़्तर से अपने घर की और जा रहे थे. मुमकिन था कि उन बेशुमार गाड़ियों में कुछ रंगीन चेहरे तो कुछ मायूस मन होंगे. कोई ज़ोर ज़ोर से गाने सुनते हुए घर वापस जा रहा है तो कोई बस ट्रैफिक के समंदर को परेशानी से चीरते हुए आगे बढ़ रहा है. ठीक उन्हीं गाड़ियों में एक कार की बात कर रहा हूँ. वो कार एक खूबसूरत लड़की चला रही थी. और शहर के अख़िरी ट्रैफिक सिंग्नल से गुजरते हुए उसकी आंखें भर आती थी. और बड़ी हिम्मत से वो अपनी आंख में आए आंसुओ को रोककर रखती थी. चाहती तो थी कि यहां से न गुजरे वो लेकिन इस राहगुज़र से रोज़ गुजरना अब उसका अख़िरी फ़र्ज़ था. यह वही जगह थी जहां उसको अपना हमसफ़र मिला था. जिसके साथ ज़िन्दगी जीने के वादे हुए थे. सुबह से लेकर शाम तक वो खुद से कई समझौते कर लेती थी. अपने काम करने की जगह पर अपने साथीदारों के साथ झूठ मुठ सा मुस्कुरा भी लेती थी. घर जाकर किताबों में डूब लेती. एक बड़े से घर में तन्हा थी वो. कौन था जो उसकी ज़िन्दगी का अख़िरी सहारा था. "उसका शौहर?" नहीं नहीं वो शादीशुदा नहीं थी. वो सहारा था उसका 'बेटा' जिस ट्रैफिक सिंग्नल पर अपना हमसफ़र मिला था उसने शादी नहीं की थी उससे. हज़ारों वादों के बीच एक गलती का बीज बोया था उसने. हुआ ऐसा की शादी के पहले उन्हें एक बेटा हो गया. फिर भी वो परेशां नहीं थे न कि इसे अपनी गलती मानते थे. क्यों कि वे एक दूसरे के जीवनसाथी बनने वाले थे. मगर ज़िन्दगी की किसी शाम के वादे पर उस अपने हमसफ़र ने धोखा दिया था. वो मुड़कर कभी नहीं आया. अपने मां बाप से नाफरमान होकर अकेली रही वह उम्र भर. छोटा-मोटा काम करते हुए उसने उस नाजायज बेटे को पालने लगी. फिर अब इस दुनिया में कोई नहीं था. बेटा 5 साल का हुआ तब तक वह काफी गम भूल चुकी थी. अपने उस हमसफर को भी वह अब खुल चुकी थी लेकिन. अब उसे सिर्फ दुनिया नजर आती तो अपने बेटे में नजर आती थी. हु इस बात से भी परेशान थी कि वह सब अपने बाप का नाम पूछेगा तो वह क्या कहेगी? लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और जिंदगी को जीते रही. लेकिन एक रोज ऐसा हुआ कि एक लाइलाज बीमारी के चलते अपने बेटे को आकर खुदा के फरिश्ते उसकी आंखों के सामने से ले गए. न जाने कितने हफ्तों तक खुद की जांच से समझौते करने लगी. कई बार तो आंख में आंसू भी नहीं आते थे. आज भी वह अपने बेटे से ज्यादा तो उस ट्रैफिक सिग्नल को देखकर ज्यादा रोती है. जहां जिंदगी के धोखे ने उसका हाथ थामा था.

____ Mogal Istiyak

Thursday, 21 February 2019

Faleesh poem

कसकर तुझको कमर से पकड़ूंगा
फिर
तेरे होठों के करीब मेरे होंठ लाकर

एक जरा सी दूरी बनाए रखूंगा
जो तुझको बेचैन कर दे..!!
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फलीश